Thursday, May 31, 2012

Thursday, March 8, 2012

मंह मंह बेल कचेलियाँ 'नामवर सिंह'


मंह-मंह बेल कचेलियाँ, माधव मास
सुरभि-सुरभि से सुलग रही हर साँस
लुनित सिवान, संझाती, कुसुम उजास
ससि-पाण्डुर क्षिति में घुलता आकास
फ़ैलाए कर ज्यों वह तरु निष्पात
फैलाए बाहें ज्यों सरिता वात
फैल रहा यह मन जैसे अज्ञात
फैल रहे प्रिय, दिशि-दिशि लघु-लघु हाथ!

आप दुनिया भर से उल्फत कीजिये 'नातिक़ लखनवी'

आप दुनिया भर से उल्फत कीजिये
मुझको मेरा दिल इनायत कीजिये


ज़ब्त से क्या खून-ए-हसरत कीजिये
एक नाला कर के फ़ुर्सत कीजिये

जोअफ़ कहता है के मंजिल दूर है
शौक़ कहता है की हिम्मत कीजिये

गर्क ही होना था मंज़ूर-ए-खुदा
न-खुदा की क्या शिकायत कीजिये

हज़रात-ए-'नातिक' जहाँ तक हो सके
अपने दिल में ज़ब्त-ऐ-उल्फत कीजिये

Sunday, May 22, 2011

forgot the name of poet, but a beautiful poem it is !!!

खुली पाठशाला फूलों की
पुस्तक-कॉपी लिए हाथ में
फूल धूप की बस में आए



कुर्ते में जँचते गुलाब तो
टाई लटकाए पलाश हैं,
चंपा चुस्त पज़ामें में है -
हैट लगाए अमलताश है ।



सूरजमुखी मुखर है ज़्यादा
किंतु मोंगरा अभी मौन है,
चपल चमेली है स्लेक्स में
पहचानों तो कौन-कौन है ।



गेंदा नज़र नहीं आता है
जुही कहीं छिपाकर बैठी है,
जाने किसने छेड़ दिया है -
ग़ुलमोहर ऐंठी-ऐंठी है ।



सबके अपने अलग रंग हैं
सब हैं अपनी गंध लुटाए,
फूल धूप की बस में आए -
मुस्कानों के बैग सजाए ।

सब जीवन बीता जाता है - 'जयशंकर प्रसाद'

सब जीवन बीता जाता है
धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है

समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,
आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है

सब जीवन बीता जाता है.